मैं खुद में उलझी हूं


मैं खुद में उलझी हूं, तुझको कहां से पाऊ
मेरे वजूद का पता नहीं आज, कही तुझमे ना खो जाऊ
मेरे दिन रात कुछ बिखर से गए हैं, समेटने के लिए हाथ कहा से लाऊ
आखे अब सूखती ही नही ठीक से, जखम की दवा  कहां से लाऊ
मेरी रूह ने कबूल किया था तुझे, अब इसे कैसे मनाऊ
तेरे साथ हस्ती थी मैं, कही तुझमे ना रो जाऊं

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